शिक्षा का क्षेत्र हो या व्यापार का , किसी भी क्षेत्र में अनुशासन के बिना सफलता नहीं पाई जा सकती।
अनुशासनहीन व्यक्ति हर काम करने की कोशिश तो करते हैं लेकिन उनमें किसी भी काम को करने का दृढ़ संकल्प नहीं होता है। कुछ उदार चिंतकों ने अनुशासनहीनता को व्यक्ति की स्वतंत्रता माना है। परंतु किसी हवाई जहाज में बैठने के दौरान हम यही चाहते हैं कि जहाज का पायलट अनुशासित रहे। वह उन कामों को करें जो उनसे उम्मीद की जाती है न कि अपने मन की मौज के मुताबिक काम करें।
हम नहीं चाहेंगे कि हवाई जहाज का कोई ऐसा पायलट हो जो कि दर्शनशास्त्र में विश्वास करता हो कि मैं आजाद हूं । और यह कहे कि मैं नहीं चाहता कि कोई मुझे कंट्रोल टावर से यह बताएं कि मुझे क्या करना है।
अनुशासन की कमी का कारण , लगातार कोशिश की कमी होती है। अनुशासित रहने के लिए त्याग एवं आत्म नियंत्रण की आवश्यकता होती है । लालच , आलस और ध्यान भटकाने वाले कारकों से बचाना पड़ता है।
अनुशासन का उद्देश्य यह होता है कि हम लक्ष्य पर ध्यान लगाएं।
अनियमित रूप से की गई कड़ी मेहनत से कहीं बेहतर है - ‘ नियमित रूप से की गई थोड़ी-थोड़ी कोशिश ' जो कि आपके अनुशासन से ही आती है।
मेरे भाई ! अनुशासन और पछतावा दोनों ही दुखदायक/कष्टदायक हैं। हर किसी को इन दोनों में से किसी एक को चुनना ही पड़ता है। जरा-सा महसूस करके देखिए इन दोनों में से ज्यादा तकलीफदेह क्या है ?
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