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Showing posts with the label प्रेरणादायक

समस्या का सामना

यह सच है कि  मुश्किलें ही हमें अवसर प्रदान करती है। हम में से कुछ ही ऐसे लोग होंगे जो इसका अर्थ समझते हैं क्योंकि अधिकांश लोग मुश्किल समय में अपने भाग्य को कोसते हैं या नुकसान होने पर रोना रोते हैं, जबकि ऐसे समय में हमें इन परिस्थितियों का सामना करना चाहिए। छात्रों के लिए परीक्षा , एक सबसे कठिन चुनौती होती है । परंतु जीवन में सफल होने की दिशा में यह सबसे महत्वपूर्ण कदम है । परीक्षाएं वास्तव में हमारे मुश्किल समय का परीक्षण होती हैं और यदि हम अपने जीवन की समस्याओं का रोना रोकर समय बर्बाद करने के बजाए एक व्यवस्थित योजना के साथ उनका सामना करें तो हमें सफल होने से कोई नहीं रोक सकता।  तो आइए हम एक साधारण कहानी की मदद से इस बात को समझने की कोशिश करते हैं। एक बार की बात है, एक छोटी सी लड़की जो अपने जीवन से बहुत दुखी थी, अपने पिता से कहा “मैं अपने जीवन में अब और संघर्ष नहीं करना चाहती। ऐसा लगता है कि एक समस्या हल नहीं हुई और दूसरी  शुरू हो गई।” उसके पिता जो एक शेफ थे, उसे रसोई में ले गए। उन्होंने पानी से भरे तीन बर्तन तेज आंच पर गर्म करने के लिए रख दिये। जब तीनों बर्तनों म...

एक आदर्श शिक्षक और प्रेरणा स्रोत डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन

5 सितंबर सन 1888 को तमिलनाडु को मद्रास में जन्में में डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन अपने जीवन के 40 वर्ष शिक्षक के रूप में व्यतीत किये। डॉक्टर राधाकृष्णन एक प्रख्यात शिक्षाविद् तो थे ही एक दार्शनिक, उत्कृष्ट वक्ता, और एक हिंदू विचारक भी थे। आजादी के बाद डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति बने और उसके बाद यह भारत के दूसरे राष्ट्रपति भी बने। डॉ राधाकृष्णन कहते थे  कि किताबें पढ़ना हमें एक चिंतन व सच्चे आनंद की अनुभूति देता है जिसके माध्यम से हम दो संस्कृतियों के बीच पुल का निर्माण कर सकते हैं। शिक्षक के रूप में उनका व्यक्तित्व ऐसा था कि उन्होंने अपना जन्मदिन अपने व्यक्तिगत नाम से नहीं बल्कि संपूर्ण शिक्षक को सम्मानित किए जाने के उद्देश्य से शिक्षक दिवस के रूप में मनाने की इच्छा व्यक्त की। जिसके बाद आज की पुरे देश में इनके जन्मदिन 5 सितंबर को प्रतिवर्ष शिक्षक दिवस के रूप में देश मनाता है। डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन पूरे संसार को एक शिक्षालय मानते थे । उनका मत था कि शिक्षा के द्वारा ही मानव अपने मस्तिष्क का सदुपयोग कर सकता है । इसलिए समस्त विश्व को एक इकाई मानकर...

स्थायी आनंद की प्राप्ति कैसे संभव है ?

अपने जीवन में दुःख की इच्छा कौन रखता है ? निःसंदेह कोई नहीं !  हम हर पल आनंद की आकांछा  रखते हैं  और इसके लिए लगातार प्रयास भी करते रहते हैं |  किसी को पढने में आनंद आता है तो किसी को खेलने में ! किसी को पैसे कमाने में और उसे लुटाने में !  किसी को भगवान की भक्ति में आनंद आता है तो किसी को बड़ी -  बड़ी बाते करने में !      पर ! अक्सर यह होता है कि हम जितना आनंद के पीछे भागते हैं , आनंद हमसे उतना ही दूर भागता हुवा दिखाई देता है | कभी - कभी तो हमारी स्थिति ऐसी  जाती है जैसे किसी मरुस्थल में पानी न मिलने पर एक मृग की होती है , जिसके कारण से हम निराशा से भी घिर जाते हैं |      हमें  एक बात जरुर समझ लेनी चाहिए कि आनंद पाने के सबसे जरूरी चीज होती है -  जीवन में सरलता और सहजता !     जैसे - जैसे हम अपना जीवन सरल और सहज बनाते जाते हैं  वैसे - वैसे ही हमे आनंद की अनुभूति भी होने लगती है |  हम यह हर रोज देखते है कि छोटा बच्चा  सदैव ही आनंद और मस्ती  में  रहता है | कभी सोंचा है ...

नोबल विजेता काजुओ इशिगुरो ( Kazuo Ishiguro ) की ये बातें जरूर पढ़नी चाहिऐ

  वर्ष 2017 की  साहित्य क्षेत्र में नोबल पुरस्कार पाने वाले जपानीज मूल के ब्रिटिश लेखक काजुओ इशिगुरो का एक सफल लेखक बनने की कहानी बड़ा ही रोचक है।  काजुओ इशिगुरो अपने  उपन्यास  "  द रिमेन्स आफ द  डे  "  से काफी प्रसिद्धि प्राप्त की और  इसके लिए इन्होनें मैन बुकर प्राइज भी पायी।  इशिगुरो  , उपन्यास के साथ - साथ छोटी - छोटी कहानियाँ भी लिखते हैं , गीतकार और स्तंभकार भी हैं ।         काजुओ इशिगुरो कहते हैं  कि किसी भी क्षेत्र में सफल होने के लिऐ कठोर अनुशासन और अपनी प्राथमिकता का निर्धारण करना बेहद जरूरी होता है।  काजुओ का  जन्म जापान के नागाशाकी में 8 नवम्बर 1954 को हुआ था। 5 वर्ष की आयु में अपने  माता-पिता के साथ जापान छोड़कर इंग्लैण्ड आ गये और यहीं की नागरिकता ले ली।   दोस्तों !!    इशिगुरो नोबल पुस्कार के लिए नामिनेट होने के बाद अपने लेखन संघर्ष से संबंधित कुछ बाते साझा की जिसे हम यहाँ रख रहे हैं। वो कहते हैं ………    "  पहल...

विद्यार्थी और उसका कर्तव्य ( Student And Their Duties )

किसी भी देश की सबसे मूल्यवान पूंजी होती है उस देश की युवा शक्ति ! हमलोगों के देश में तो इसे सदियों से माना जाता है | हमारे ऋषि मुनियों ने भी  युवाकाल को बहुत अधिक महत्व दिया है |  प्राचीन आचार्यों ने तो मानव जीवन को चार भागों में विभाजित किया है - ब्रम्हचर्य , गृहस्थ , वानप्रस्थ  और संन्यास | इनमे प्रथम ब्रम्हचर्य आश्रम विद्यार्थी जीवन के लिए होता है | इस अवस्था में विद्यार्थी के कुछ कर्तव्य होते है जिनका समुचित पालन करके वह अपने आपको भावी जीवन के योग्य बनता है | इस जीवन के क्रिया कलापों के द्वारा ही उसके भावी जीवन का निर्माण होता है |  विद्यार्थी के जीवन को सही मार्ग पर चलाने का प्रथम दायित्व अभिभावकों और समाज का  होता है | विद्यार्थी के प्रारम्भिक जीवन में उसे हर प्रकार से नियमित और अध्ययनशील बनाने का प्रयत्न करना चाहिए | उसके रहन - सहन , संगति पर प्रारम्भ से ही ध्यान देने की जरुरत होती है | आवश्यकता पड़ने पर उसे सुविधायें तथा गलती करने पर उसे दण्ड  भी देना चाहिए ताकि वह  अपने कर्तब्य को समझे और उससे उसका ध्यान न भटकने पाये | विद्यार्थी का...

महज 21 साल की उम्र में IAS Officer बने अंसार अहमद शेख

अंसार अहमद शेख महाराष्ट्र के मराठवाड़ा के रहने वाले हैं | इनके पिता यूनिश शेख एक ऑटो रिक्शा चालक हैं | अंसार अहमद अपनी पहली कोशिश  में ही मात्र 21 साल की आयु में  वर्ष 2015 की UPSC की सिविल सर्विस  परीक्षा में सफलता प्राप्त कर ली | UPSC द्वारा आयोजित की जाने वाली सिविल सर्विस परीक्षा अपने देश की सबसे कठिन परीक्षाों में से एक  मानी जाती है | इस परीक्षा में  प्रत्येक वर्ष लाखों प्रतियोगी भाग लेते हैं और इस परीक्षा के लिए कई कई साल तक तैयारी करते हैं | उनमे से कुछ सफल होते है और बहुत असफल |  अंसार के पिता की तीन पत्निया है उनमे से दूसरी पत्नी अंसार अहमद शेख की माँ हैं | गरीबी के कारण अंसार के पिता इन्हे  किसी अच्छे विद्यालय में शिक्षा नहीं दिला पाए  पर यह कमी अंसार की सफलता में बाधक नहीं बनी क्योंकि अंसार  अहमद शेख एक मेधावी , प्रतिभशाली और मेहनती छात्र थे |  अंसार कहते हैं  " मेरे पिता एक रिक्शा चालक हैं और उनकी तीन पत्नियाँ हैं | मेरी माँ उनमे से दूसरी है |  मेरी दोनो छोटी बहनों की शादी छोटी उम्...

महिला सशक्तिकरण क्यों है जरूरी

पूरे विश्व में केवल हमारा भारतवर्ष ही ऐसा है जहाँ नारी को शक्ति , सृजन और सम्मान का प्रतीक माना जाता है। हमारे धर्मग्रंथ नारी शक्ति के महिमामण्डन से भरे पडे हैं। हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि जहाँ नारी की पूजा होती है वहीं देवताओं का निवास होता है। एक ओर जहाँ नारी को सहनशीलता , कोमलता और क्षमाशीलता की देवी माना जाता है वहीं जरूरत पड़ने पर यह दुर्गा का भी रूप धारण कर लेती है। प्रकृति ने वंश वृद्धि की जिम्मेदारी जो नारी को दे रखी है वह न केवल एक दायित्व है बल्कि एक चमत्कार भी है। अथर्ववेद में नारी को धर्म का प्रतीक कहा गया है। कोई भी धार्मिक कार्य उसके बगैर पूरा नहीं माना जाता है। वहीं आज उसी नारी का दुनियाभर में उत्पीड़न बढ़ता जा रहा है। उनकी सहनशीलता और सहजता को ही उनकी कमजोरी समझा जा रहा है। हालांकि बहुत से देश हमारा देश भी ! महिला शक्ति को पहचानकर उनके सशक्तिकरण की राह पर आगे बढ़ चले हैं। नारी अपने आत्मविश्वास के बल पर अब दुनिया में एक अलग पहचान बनाने में सफल हो रही हैं। शिक्षा के कारण उनमे जागरूकता आयी है और वो आर्थिक और मानसिक रूप से आत्मनिर्भर हो रहीं हैं। सच तो यह...

समय का सदुपयोग

" लड़कपन खेल में गुजरा , जवानी नींद भर सोयी , बुढ़ापा देखकर रोया वही किस्सा पुराना है " ये सिर्फ एक गीत की पंक्ति नहीं है ! यह कटाक्ष है ! उन लोंगो पर जो समय के महत्व को नहीं समझते। जो भी समय के महत्व को समझकर उसका सदुपयोग करता है उसका जीवन सुखमय होता है । पूरे विश्व में जितने भी महापुरुष हुवे उनके जीवन - यात्रा को एक बार पढ़िये तो पता चलता है कि वे सब अपने पूरे जीवन में  समय की साधना किये हैं , समय का सदुपयोग किये हैं। समय धन से भी कीमती हम सब के लिए अमूल्य है। धन तो वापस पाया जा सकता है परन्तु समय एक बार ब्यतित हो गया तो दोबारा उसे प्राप्त नहीं किया जा सकता है।    समय अपनी गति से बढ़ता चला जाता है | वह किसी के लिए नहीं रुकता और न ही उसे रोकने की शक्ति किसी में है | वास्तव  में समयानुसार आवश्यक तथा उचित कार्यों को संपन्न करना करना ही समय का सदुपयोग है |         जीवन में समय के सदुपयोग महत्व को समझने के अलावा  जरुरी है कि हम अपने कार्य की प्राथमिकताओं  आधार पर अपने समय को विवेक  विभाजित कर लें ताकि कार्य की  महत्त...

सुबह की ये 6 आदत आपको भी सफल बना सकती है

      दोस्तों !  इन 6 आदतों को बतानें से पहले मैं आपको  सन 1999 ई• में ले जाना चाहता हूँ। दिसम्बर 1999 में 20 वर्ष के हेल एलराड ( Hal Elrod ) नाम के एक व्यक्ति का आफिस से घर जाते वक्त कार दुर्घटना हो गई । यह दुर्घटना इतनी भयानक थी कि उनकी कार एकदम नष्ट हो गई थी।  हास्पिटल में इलाज के दौरान उनकी सांसे 6 मिनट के लिए रूक गई । और वो मर गऐ ! फिर 6 मिनट के बाद ही उनकी सांसें फिर से चलने लगी । लेकिन ! वो कोमा में चले गऐ । इस दुर्घटना में उनका Brain damage हो गया था , शरीर की 11 हड्डिया टूट गयी थी। 6 दिन कोमा में रहने के बाद 7 वें दिन जब वें कोमा से बाहर आये तो डाक्टरों ने उनसे कहा कि वो अब कभी भी चल - फिर नहीं पाऐंगे। हेल एलराड उन डाक्टरों को गलत साबित करते हुवे आज एक अन्तर्राष्ट्रीय बेस्ट- सेलिंग  लेखक हैं और एक प्रखर motivatioal speaker  हैं। दोस्तों ! मरने के बाद जिन्दा होकर फिर डाक्टरों को गलत साबित कर सफलता के इस मुकाम पर वो कैसे पहुँचे ?   हेल एलराड इस बारे में बताते हैं कि कोमा से निकलने के बाद उन्होने 6 morning habbit ब...

पढाई में मन कैसे लगाऐ

नमस्कार दोस्तों ! कैसे हैं आप ? क्या आपको भी ऐसा लगता है कि आपका मन पढ़ाई में नहीं लगता ? आप चांहकर भी पढाई पे concentrate नहीं कर पाते हो ?  तो आइये आज हम इसी पर बात करते हैं कि आखिर पढाई में मन क्यों नहीं लग रहा ! किसी ने कहा है कि जैसा हम सोंचते हैं , हमारा शरीर वैसे ही क्रियाऐं करता है। जैसे मान लो आप किसी थियेटर में कोई पिक्चर देख रहे हो यानी इससे पहले आपके दिमाग में पिक्चर देखने का विचार आया होगा ! तभी आप निकले होंगे पिक्चर देखने ! हम पढाई करने नहीं बैठते तो इसका मुख्य कारण यह है कि हमारे दिमाग में पढाई का विचार नहीं चलता ! इसके जगह फालतु के विचार चलता रहता है और इसी में समय ब्यतित हो जाता है। अब वो कारक हमें ढूँढना होगा जो हमारे विचारों को इस प्रकार से प्रभावित करते हैं जैसे मोबाईल , टीवी , मित्रगण आदि। निश्चित ही यदि इन कारकों का संयमित उपयोग किया जाऐ जिससे हमारा ध्यान पढाई से भटके ना , तो हमारा पढाई में मन लगेगा।

दूसरों के आदर्शों पे चलने से अच्छा स्वयं को आदर्श बनाओ

स्वामी जी कहते हैं अपना आदर्श लेकर उसे चरितार्थ करने का प्रयत्न करे। दूसरों के आदर्शों को लेकर चलने के अपेक्षा , जिनको वह पूरा कर नहीं सकता ,  उससे अच्छा उसे अपने आदर्शों को ...

लक्ष्य प्राप्ति के लिए बेचैनी होनी चाहिऐ

एक बार एक संयासी समुद्रतट के किनारे- किनारे टहल रहे थे उसी वक्त एक ब्यक्ति उनके  पास पहुँचा , प्रणाम किया और पूछा  " महाराज !भगवत्तप्राप्ति कैसे हो सकती है ? " संत महाराज यह सुनकर उसे समुद्र के अन्दर कुछ गहराई तक ले गये और उसे पानी के अन्दर डुबोया उसे तब तक डूबोये रखा जब तक वह छटपटाने नहीं लगा।  उसके बाद उन्होने उसे बाहर निकाला और पूछा ,  " यह बताओ पानी के अन्दर तुम्हे कैसा लग रहा था ? " उस ब्यक्ति ने कहा  " महाराज ऐसा लग रहा था जैसे कि अब  इसी क्षण मरने ही वाला हूँ  और बाहर निकलने के लिए छटपटा रहा था। " संत ने कहा " जिस प्रकार तुम पानी के अन्दर  बाहर निकलने के लिए छटपटा रहे थे ठीक उसी प्रकार जब भी तुम उस परमात्मा को पाने के छटपटाओगे उस वक्त ही तुम उन्हे प्राप्त कर सकते हो। " सीख : किसी भी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उसको प्राप्त करने की बेचैनी होनी चाहिए ।

जितने दिन जीना है उतने दिन सीखना है

मनुष्य जीवन पर्यन्त सीखने वाला सामाजिक प्राणी है । स्वामी जी भी यही कहते हैं जितने दिन जीना है उतने दिन  सीखना हैं पर यहाँ एक आवश्यक बात ध्यान में रखने योग्य हे कि जो कुछ सीखना हैं उसे अपनौसाँचे में ढ़ाल लेना है। अपन असल तत्व को बचाकर बाकी चीजें सीखनी हैं। सार शिक्षा का ध्येय यही है कि मनुष्य का सर्वांगीण विकास । जो शिक्षा मनुष्य को उसके जीवन को समर्थ  बना सकती , जो मनुष्य में चरित्र-बल ,पर-हित भावना तथा सिंह के समान साहस नहीं ला शक्ति , वह कोई शिक्षा हो ही नहीं सकती।  शिक्षा का अर्थ पठन मात्र है क्या ? नहीं ! शिक्षा का अर्थ विभिन्न प्रकार के ज्ञानार्जन भी नहीं है।  वास्तव में शिक्षा तो वह है  जिससे हम अपने जीवन का निर्माण कर सकें , मनुष्य बन सकें , चरित्र का गठन कर सकें और विचारों आ सामंजस्य कर सकें वही वास्तव में शिक्षा है।

स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का वास होता है

स्वामी विवेकानन्द जी का कथन हैं जीवात्मा की वासभूमि इस शरीर से ही कर्म की साधना होती है। जो इसे नरककुण्ड बना देते हैं वो अपराधी हैं और जो इस शरीर की रक्षा में प्रयत्नशील नहीं होते वे भी दोषी हैं। शारीरिक दुर्बलता कम से कम हमारे एक तिहाई दुखों का कारण हैं। नियमित व्यायाम के बिना यह शरीर स्वस्थ नहीं रह सकता। अशुद्ध जल और अशुद्ध भोजन रोग का घर है । शारीरिक स्वास्थ्य के लिए रोज सुबह उठो , टहलों , शारीरिक परिश्रम करो । यदि शरीर अस्वस्थ रहेगा तो मन कैसे स्वस्थ रह पाएगा।

स्वामी विवेकानन्द के ये शब्द बहुत प्रेरणा देने वाले हैं

उठो, साहसी बनो, वीर्यवान बनो। सब उत्तरादायित्व अपने कन्धे पर लो। याद रखो कि तुम स्वयं अपने भाग्य क निर्माता हो। तुम जो कुछ बल या सहायता चाहो, वह सब तुम्हारे भीतर ही विद्यमान है । अत: इस ज्ञानरूप शक्ति के सहारे तुम बल प्राप्त करो और अपने हांथों अपना भविष्य गढ़ डालो।